amanatein (Rajpoot)

वास्तविकता का इक झरोखा..

14 Posts

168 comments

amanatein


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

मैं हूँ उन्ही में से….

Posted On: 20 Jul, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

2 Comments

मुझे कट्टरता पसंद है….

Posted On: 2 Nov, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

5 Comments

क्यूंकि वह अब जिंदा नहीं है….

Posted On: 26 Sep, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

9 Comments

मेरा इश्क …

Posted On: 16 Sep, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

9 Comments

दिखावे के इस दौर में शरियत कोई गारंटी नहीं….

Posted On: 8 Sep, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

16 Comments

ओणम समारोह का एक फोटो आप सभी के लिए

Posted On: 30 Aug, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 4.33 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

13 Comments

मेरी वो बिंदिया…

Posted On: 28 Aug, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

17 Comments

वह फ़रिश्ता मुझे निहाल कर गया…

Posted On: 23 Aug, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (8 votes, average: 4.88 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

20 Comments

मर्दों की इस दुनिया में …

Posted On: 16 Aug, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 4.67 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

15 Comments

मैं ही हिन्दू, मैं ही मुस्लिम…

Posted On: 10 Aug, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (16 votes, average: 4.81 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

32 Comments

Page 1 of 212»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: amanatein amanatein

"आज का बचपन" और "बलात्कारी के लिए क्रूरतम दंड का विधान या मानवाधिकार का ध्यान !!" इन दो ब्लोगों पर मैंने इस विषय के दर्द को उकेरने की कोशिश की है, ध्यान दीजियेगा.. आपने जिस घटना का ज़िक्र किया है वो निसंदेह घ्रणित और निंदनीय है पर चूकिं ये कुकृत्य एक विकलांग के द्वारा किया गया है अतएव ये बात पूरी तरह साबित होता है की कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से अच्छा बुरा होता है. जाति, धर्म, समूह, देश, प्रदेश, भाषा रंग, रूप, उम्र आदि के आधार पर किसी से घृणा या सहानुभूति रखना न्यायसंगत व् तर्कसंगत नहीं होता है. आपको इस तरह की घटनाये प्रभावित करती है तो निसंदेह आप भी अभी जीवित है और अच्छा काम कर रही है. बहुत बहुत बधाई.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

के द्वारा: amanatein amanatein

अमानत जी, लम्बे अन्तराल के बाद आपको पढ़ा. इस तरह के चरित्र मेरी निगाह में ताकत का नशा हैं और बेजा इस्तेमाल है. इसी क्रम में मैं भी कुछ बांटना चाहूँगा; वैसे तो किसी गोश्त की दुकान को देख कर मुझे कभी कुछ अजीब नहीं लगता पर बचपन में किसी मस्जिद के दरवाजे पर गोश्त की दुकान देख कर पता नहीं कुछ अच्छा नहीं लगता था जिसे अपनी डायरी में कुछ यूँ लिखा था; "मस्जिद के मुहाने पर एक गोश्त की दुकान बंधा वहा एक मेमना था बड़ा हैरान परेशान बगल में बंधे अब्बा से वो मासूम कुछ यूँ फरमाता है लगता है यही रास्ता सीधे खुदा के पास ले जाता है." किसी भी धर्म में कट्टरता, अमानवीयता, अन्धविश्वास और परउपदेश मुझे हमेशा से सालते है. आपका लेख मेरे ऐसे भावों को उद्देलित करता है. मैं ये मशाल जलते रहने की प्रार्थना करता हूँ. आपकी जंग जायज़ है कोशिश जारी रखिये हमारा समर्थन ऐसी विचारधारा के साथ है.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

सुस्वागतम........! देखने में बड़े दिखने वाले इन उलेमाओं के कर्म इतने छोटे की समानता तो अपने ही मुस्लिम समाज में नज़र नहीं आती तो फिर दूसरों पर क्यूँ और कैसा इलज़ाम? और इस भेदभाव पर एक कटीला शेएर याद आता है- खिरद ने कह भी दिया ला इलाहा तो क्या हासिल, दिल व् निगाह मुसलमा नहीं तो कुछ भी नहीं.................सच को व्यक्त करता हुआ........विचार......... आपके ब्लॉग पर यह मेरा पहला कमेन्ट है परन्तु आगमन पहला नहीं...........चूँकि मेरा ब्लॉग बंद कर दिया गया था अतः मैं को कमेन्ट नहीं दे प् रहा था.........फिलहाल आज इतना ही कहना चाहूँगा.........आज आप जैसे लोगों की हरेक धर्म और व्यवस्था में जरुरत हैं.यही समय और सत्य की मांग हैं..........हार्दिक आभार.........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: amanatein amanatein

के द्वारा: amanatein amanatein

दिनेश जी इतने सुन्दर कमेन्ट के लिए तहे दिल से शुक्रिया..मेरे विचार अवश्य खुदा की अमानत है मैं नहीं..क्यूंकि कभी कभी मुझे भी गुस्सा आ जाता है और तो और कुछ लोगों की गलतियों को मैं आजकल तो छोडिये जीवन भर माफ़ नहीं कर पाती..इसके विपरीत खुदा माफ़ कर सकता है. कारन वह खुदा है..और उसका दिल अपने बन्दों के सच्चे आंसुओं पर पिघल जाता है लेकिन शायद मेरा नहीं..मेरी नज़र मैं सबसे बड़ा बुरा इन्सान एक धोखेबाज़ है..ख़ास कर वो धोखेबाज़ जिसने आपसे प्यार में छल किया हो..ऐसे लोग मेरी नज़र में जीवन भर माफ़ी के काबिल नही..खैर..मुझे बहुत अच्छा लगा जानकार की इस दुनिया में कोई तो है जो मेरे ही जैसे विचार रखता है और उसकी आत्मा भी मेरी आत्मा की तरह किसी भी बुराई पर रो उठती है, झुंझला उठती है..वरना मैं तो समझी थी कि वो खुदा मुझे ऐसे विचार देकर केवल एक सहयोगी देना भूल गया है..या फिर मुझे पैदा करके भूल गया है..कमेन्ट के लिए तहे दिल से एक बार फिर शुक्रिया..और आपके उत्तर की प्रतीक्षा में..क्यूंकि जीवन पता नही दोबारा मिले भी या नही इसी जीवन में मैं कुछ कर गुज़र जाना चाहती हूँजिसे आपका सहयोग सफल बनाएगा....आपके सहयोग के इन्तिज़ार में.. अमानत.अपने एक ब्लॉगर साथी के आग्रह पर मैंने ओणम त्यौहार का अपने ऑफिस का एक फोटो भी आप सभी के लिए प्रेषित किया है..

के द्वारा: amanatein amanatein

सचमुच आप खुदा की अमानत हो, इनते उच्च विचार उसकी अमानत के ही हो सकते हैं। आपका कट्टरता का विरोध करना, ऐसा लगा कि जैसे आपकी जगह मैं हूँ। ऐसी जगह पर मैं भी इसी तरह से विद्रोही हो जाता हूँ। मेरे यहाँ एक मुगल कालीन लोटा था। मेरे एक रिश्तेदार मेरे यहाँ आये और वह लौटा देखकर कहने लगे कि हिन्दु के घर में मुगलयाई लौटा शोभा नहीं देता। इनता सुनते ही मेरा आक्रोश  फूट पड़ा- "तुम लोग क्या चाहते हैं। तुमने इंसानों को तो धर्म और जाति के नाम पर बाँट रखा  है। अब बरतनों को भी बाँट रहे हो। बरतनों के भी तुमने धर्म बना दिये। तुम्हारा वश चले तो  तुम कुत्तों एवं गायों आदि को भी धर्मों में बाँट दोगे। क्यों इस तरह की बाते करके समाज में  नफरत फैलाते हो। तुम लोग ही असली नास्तिक हो। ईश्वर के बनाये नियम के विरुद्ध चलते  हो। उनके पास कोई उत्तर नहीं था वह अपना सा मुँह लेकर चले गये।" आपका यह आलेख पढ़कर वह बहुत पूरानी घटना याद हो आई..... आपके विचारों को नमन......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

अमानत जी, मैं व्यक्तिगत रूप से औरत और मर्द के बीच किसी तुलनात्मक विश्लेषण के विरुद्ध हूँ क्योकि औरत मर्द एक दूसरे के पूरक है न कि प्रतिद्वंदी. प्रतिद्वंदिता सिर्फ गुणों के मध्य होती है आपने जिस भाव से दृष्टान्त लिखा है वो एक मानवीय गुण है जो शायद हर इंसान में नही पाया जाता जिसकी वज़ह से झगडे फसाद होते रहते है. अगर उस लड़की से पहले कोई लड़का उस व्यक्ति की मदद कर देता तो स्त्री जगत बुरा नहीं हो जाता. ये उस लड़की की अच्छाई है जो मानव जाति में अपेक्षित है. हमें मानव की बुरी आदतों से लड़ना है ना कि जाति, धर्म, वर्ण, लिंग आदि को आधार मान कर आपस में लड़ना है. आपकी सकारात्मक सोच के बीच जाति, धर्म, वर्ण, लिंग आदि का भेद आपकी जंग को कमजोर कर सकता है. आशा है आप इसे अन्यथा न लेंगी.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

अमानत जी, भावप्रवण रचना, रचना में अर्थ लिखने के लिए आप फार्मेट यूँ (अधोलिखित) इस्तेमाल करेंगी तो किसी भी रचना की तारतम्यता बनी रहेगी और पढने में अच्छा लगेगा. बिना मांगे राय दे रहा हूँ इसलिए गुस्ताखी माफ़. ........ काबिज़ मेरे ज़मीर पे यूँ गर्द हो गयी है ज़िन्दगी किसी गरीब की जैसे क़र्ज़ हो गयी है, रिश्तों के ख़ुलूस को अब क्या कहिये पत्तों पर जमी जैसे ज़र्द हो गयी है, मेरा धर्म तेरा धर्म की इस जंग में दुनिया तो जैसे नर्क हो गयी है, प्यार लुटाया तो भी प्यार को लूटा हक तो जैसे इसी पे शरअ हो गयी है, चेहरे पे चेहरा और दिल भी दगाबाज़, मासूमियत तो जैसे तर्क हो गयी है. ........ गर्द -धूल, क़र्ज़ -उधार, ख़ुलूस - अपनापन, ज़र्द -पीलापन, जंग -युद्ध, शरअ - शरियत का लागू होना, तर्क - गायब, खो जाना.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

भारतीय संस्कृति में एक कहावत प्रचलित है- नर सेवा नारायण सेवा॥ इसी आधार पर धर्मग्रंथों में निष्कर्षरूप में सदैव यही कहा जाता है कि- "परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥" सभी धर्मग्रंथों के समुच्चय का भी यही निष्कर्ष दिया गया है- "अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचंद्व्यम। परोपकाराय पुण्याय च पापाय पर पीडनम॥" परोपकार, परहित व परसेवा ही एक मात्र धर्म है, एकमात्र पुण्य है और परपीड़न ही एकमात्र अधर्म और पाप है। परसेवा कहावत की नरसेवा से भी कहीं आगे जीवमात्र की सेवा, कष्ट हरण व प्रेम का निर्देशन करती है। इसी कारण जीव मात्र ही ब्रम्ह का स्वरूप है। उससे भिन्न ईश्वर का कोई स्वरूप नहीं है... गीता का "यो माम् पश्यति सर्वत्र सर्वम् च मयि पश्यति", तथा "ममैवांशों जीवलोके जीवभूतः सनातनः" आदि निर्देशन इसी परम दर्शन की घोषणा करता है कि संसार में जीव मात्र ही ईश्वर है... मेरे अनुसार यह धर्म व दर्शन की पराकाष्ठा है। इससे ऊपर कुछ नहीं..!!! एक बहुत ही उत्कृष्ट भावना व संदेशपूर्ण लेख.! ईश्वर आपको प्राणिमात्र की सेवा का संकल्प व सतत सामर्थ्य प्रदान करे॥

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: amanatein amanatein

नमस्कार संजय जी, सराहना करने व् आशीर्वाद देने के लिए दिल से शुक्रिया. कुरान के साथ साथ मैंने कुछ मनुस्मर्ती व् उपनिषद के कुछ अंशों को पढ़ा है उन्हें पढने के बाद मुझे महसूस हुआ कि अब किसी भी शंका को दूर करने के लिए किसी भी मोलवी के पास जाने की ज़रूरत नही. जबकि पढने व् समझने से पहले महसूस होता था कि शायद जाना चाहिए लेकिन शायद आप विश्वास न करें मैंने कुरान की केवल दो लाइन ही पढ़ी है और उसी से पूरा कुरान मेरी समझ में आ गया. मैं जानती हूँ किसी और को बताने व् समझाने लगी तो केवल बुराई और विरोध झेलूंगी.लेकिन फिर भी अपने कुछ दोस्तों की मानसिकता धोने का काम जारी है जो love marriage के नाम पर अपना धर्म बदलने की बात करते हैं और मैं उन्हें रोकती हूँ...और हाँ जानती हूँ की हिन्दू कोई धर्म नहीं सनातन ही है जो भी है..और वास्तव में ये खुद में आदरनिये है. खुद खुदा ने farmaya है कुरान में जो लोग देवी देवताओं को पूजते हों उन्हें कभी बुरा भला न कहना.. आभार.

के द्वारा: amanatein amanatein

नमस्कार मालिक जी, कमेन्ट के लिए शुक्रिया..आपने एकदम उचित कहा कि इस्लाम में मुल्ला मोलवी आज भी लोगों को बहुत ही गलत सलाह देते है जो लिखा है कुरान में वो तो कहीं दिखाई व् सुनाई ही नही देता. और मैं वास्तव में सहमत हूँ कि लोग बहुत ही काल्पनिक बातें करते हैं क्यूंकि जो मोलवी जी ने बता, सुना दिया बस वही सत्य समझ लिया है , खुद आम जनता ने कभी कोई किताब उठाकर पढ़ा लिखा ही नहीं तो ज़ाहिर है काल्पनिक बातें और अशिक्षित समाज बढेगा ही कम नहीं होगा. अपनी girlfriend से ज़रूर पूछना की तुमने मेरे साथ ये घटिया मजाक क्यूँ किया है? और क्या फर्क है हिन्दू व् मुस्लिम में जबकि कुरान में लिखा है कि गैर मुस्लिम भी मेरे ही बन्दे हैं..उनसे कभी कोई बैर न रखना और कहना कि आपने कुरान में पढ़ा है.उसका क्या जवाब है मुझे अवश्य अवगत करना. आप जैसे लोगों के बिना भी हम जैसों का कोई महत्व नहीं मलिक जी.. आभार

के द्वारा: amanatein amanatein

आदरणीया ,.सादर अभिवादन आपके सुन्दर पवित्र विचारों को नमन है ,..सच तो यही है की आप जैसे विचार हर युवा मन में होते हैं लेकिन घर की चौखट से शुरू होती अलगाव की यात्रा जीवन में आगे बढ़ने के साथ बढ़ती जाती है ,..अनेकों कारण इसके जिम्मेदार हैं ,....हुक्मरानों ,.पाखंडियो और देशद्रोही ताकतें मिलकर एसा व्यूह बनाती हैं की इंसान अपने मित्र से भी दूर हो जाता है ,....मेरे कई मुसलमान मित्र थे/हैं ,..प्यार मोहब्बत के अलावा कभी कोई कटु वार्ता तक नहीं हुई ,..लेकिन जब अरब टुकड़ों पर पलने वाले जाहिल तालिबानी मुल्लाओं की तकरीरें और उनके पीछे चलने वाली भेड़ें खुदा के लिए जन्नत ढूढने लगती हैं./और काफिरों को हलाक करना उनका माल असबाब लूटना नेक काम बताने लगती हैं ,.कहीं न कहीं पूरी कौम पर सवाल उठता है ,..जब आबादी बढाने के लिए लव जेहाद जैसे मामले सामने आते हैं तो मूरख इंसानों के नाजुक ह्रदयों में कट्टरता पनपने लगती है . ...हिन्दुस्तान को आप जैसे काबिल नेक ,ऊंचे इंसानी खयालात वाले युवाओं की बहुत जरूरत है ,.. मेरे एक पात्र रहमान भाई के खयालात आपसे बहुत मिलते जुलते हैं ,..हाँ वो अनपढ़ है लेकिन जाहिल नहीं !..वो भी मुसलमान से पहले हिन्दुस्तानी इंसान है ..आज जरूरत इसी बात की है हमें हिन्दुस्तानी इंसान बने ,...आपको जरूर इस बात का इल्म होगा की देश की हजारों इस्लामिक फकीरों की मजारो पर वर्षों से लाखों हिन्दुओं की भी आस्था है ,..वीरवार को आशीर्वाद लेने के लिए लेने लगी होती हैं ,..यह किसी आधुनिक महानगर में नहीं बल्कि गाँव देहातों में हैं ,.राम कृष्ण की कथा सुनाने वाले भी हैं ,.कई शायरों ने अपनी रचनाओं में राम कृष्ण की इबादत की है ,..हम शुरू से ही एक दुसरे में रचे बसे हैं ,.लेकिन अब स्थिति बदतर होती जा रही है ,..जरूरत है इसे बदलने की जिसे आप जैसे युवा जरूर कर सकते हैं ,.ताकि फिर कोई अरबी पालतू केवल हाथ धोने पर कोसी कलां (मथुरा )में दंगे न करवा सके ,.और सरकारें वोट के लिए अपराधी की पीठ न ठोंके . अत्यंत सुन्दर विचार और लेखन के लिए हार्दिक अभिनन्दन आपका ..सादर आभार सहित

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: amanatein amanatein

हाथ जोड़कर नमस्कार सर जी, अपने इतना महत्व दिया शुक्रिया...सजदा आप इश्वर के समक्ष ही करें कृपया ..जिस दिन सभी की मानसिकता धुल गयी उस दिन भेदभाव मिट ही जायेंगे. मुस्लिम समाज की दशा व् दिशा के बिगड़ने का कारन खुद उनका अशिक्षित होना है..ऊपर से जो वास्तव में कुरआन में लिखा है वो बताकर ये लोगों को आगाह नहीं करते..नहीं बताते की शिक्षा पहले हासिल करो..फिर तुम्हें कोई भटका न सकेगा..उच्च शिक्षित होते हुए भी लोग असली बात लोगों को नहीं बताते ..इससे उनका अभिमान न टूट जाये कहीं. और इश्वर अवश्य पूछेगा क़यामत के ही दिन जब हुक्म था तुम्हें शिक्षा पहले हासिल करने का तब क्यूँ उसे पूरा नहीं किया? अन्येथा तुम भटकते नहीं. और मैंने अवश्य तय किया है की अपनी नस्लों को हिन्दू मुस्लिम नहीं बनाउंगी..सिर्फ एक इंसान बनाउंगी ..जानती हूँ बहुत विरोध झेलूंगी..और इसके लिए भी में तैयार हूँ..क्यूंकि आप लोगों की दुआ व् इश्वर का आशीर्वाद है..धन्येवाद

के द्वारा: amanatein amanatein

Amanat ji ......bahut badiya aapne apni dimag ka istemaal kar k insaniyat ko paida kiya hai jo aisa nahi karte wo kattar bante hai aur samaj k liye hanikarak hote hai .aaj jo mulla malvi kar rahe hai usse wo islam wa musalmaan dono ke he zindgi zeene ka maza cheen रहे hai .aur zindgi k param satya aur sukh se vanchit kar diye gaye hai........ye unka durbhagya hai............main chahta hun ki aap apne samaj k liye kuch aisa kar jaye jisse aap is kattarta ko kuch had tak kam kar jaye......hum aap se bahut prabhavit hue isliye nahi ki yahan aap ne islam ka sach ya apne musalmaan hine ka sach ugla ya phir aap kahi na kahi se hindu ya us dharam se samati jata rahi hai .........hum aap se prabhavit sirf isliye hue kyon ki aap ne apne dimag ka sahi istemaal kar k satya ka nichod nikala hai ..........waise main aapko ye bhi batana chahunga ki meri ek girlfriend hai jisne mujhe pahle hindu brahmin bata kar dosti ki baad main uski batein sunta tha toh uski baaton se wo islam ka bahut parcham lahraya karti thi aur na jane kitni kalpnik batein kiya karti thi ye sab dekh mujhe us pe bahut tar as aata tha lakin usne kabhi bhi ye accept nahi kiya ki wo musalmaan hai .ye baat to mujhe baad main pata chali.........mujhe nahi pata ki usne mere sath aisa kyon kiya lakin uske baad se maine ye jana ki islaam main mulla maulvi logo ko bahut galat salah dete hai ...........mujhe bahut khusi hai ki aap un se bach gayi .........aur unke hukmo se ...........it is Enough........Thanks to you :)

के द्वारा: malik786 malik786

अमानत जी, आपके करबद्ध अभिवादन का शुक्रिया, मैं भी पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ और विस्मित और चमत्कृत हूँ. आपके विचार पढ़ कर मैं आपके सज्दे में जाना चाहता हूँ. कृपया मेरा शाष्टांग दडवत स्वीकारे. धर्म के नाम पर बंटवारे से मैं बचपन से हैरान रहता था, व्रत, रोज़ा और फास्ट में सर्वश्रेष्ठ ढूँढता था सोचता था जो लोग नवरात्र व्रत नहीं करते सुखी कैसे है? हम रोज़ा नहीं रखते तो क्या ज़न्नत नसीब न होगी, हम ईस्टर के बारे में कुछ नही जानते तो क्या परमात्मा हमें माफ़ नहीं करेगा. जो व्रत रहते है तो उन पर दुःख क्यों आता है? तीर्थयात्रियों की लौटते हुए हादसों में जान क्यों चली जाती है? हज के दौरान भगदड़ में इतने लोग क्यों मर जाते है इत्यादि इत्यादि. अगर जीवन के सभी confusion लिखने बैठूँगा तो शायद मुद्दे पर आ ही नहीं सकूँगा. आपके जैसे विचार वाले कितने होगे नहीं जानता पर ये सच है कि इनकी गिनती कम है और इंसानियत को ऐसे लोगो की ही जरूरत है. एक गीत याद आता है: "वाकिफ हूँ खूब इश्क के तर्ज़-ए-बयां से मैं, ऐसे में तुझको ढूँढ के अब लाऊं कहाँ से मैं.........." यदि समृधि की बात करें तो विश्व में सबसे अधिक धनवान व्यक्ति 'कार्लोस' ईसाई है, आधुनिक दुनिया का धनाड्य माइक्रोसोफ्ट का मालिक 'बिल गेट्स' नास्तिक है, भारत के 'नारायण मूर्ती' इनफ़ोसिस के मालिक हिन्दू है विप्रो के मालिक अज़ीम प्रेम जी मुस्लिम है और ब्राज़ील के एइके बतिस्ता शायद यहूदी है. इंसानियत के लिए प्रख्यात 'मदर टेरेसा' ईसाई थी अब कौन से धर्म के लोग समृद्ध या प्रेरणास्त्रोत है आप कैसे तय करेंगे? कौन सा धर्म अच्छा और कौन कम अच्छा कौन तय करेगा? इसीलिए 'इंसानियत और महब्बत' के धर्म से सर्वश्रेष्ठ कोई धर्म नहीं है. लोगो की 'खुदा' से उम्मीदों के बाद मेरी नज़र में खुदा/ईश्वर की जो तस्वीर बनी है उसे मैं दो पंक्तियों में कहूँगा कि "फलसफा महब्बत का बस इतना है इशकबाजों, खुदा हो जाओ किसी की ज़िन्दगी के लिए" (अर्थात जो किसी के काम आ सके वही खुदा है उसके लिए) और आपको पुनः धन्यवाद करता हूँ ऐसे उम्दा लेख और दृष्टिकोण के लिए और उम्मीद करता हूँ कि कम से कम आने वाली नस्लों पर ये गीत अतिश्योक्ति न होगा "तू हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा..........." आमीन. अब मैं अपनी बात इन चार पंक्तियों के साथ, जो अपने देश की कथित आज़ादी के सन्दर्भ में लिखी थी शायद यहाँ सटीक बैठेगी ऐसा मेरा विश्वास है, समाप्त करता हूँ:- "इंसानियत पे मजहब का पहरा हो, 'जात' का रंग महब्बत से गहरा हो, 'आज़ादी' का जश्न हम कैसे मनाये जब क़ानून अँधा, हुक्मरान बहरा हो.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

हाथ जोड़कर आप सभी को नमस्कार, कमेंट्स के लिए आप सभी का धन्येवाद ...पहले मैं ठीक तरह से इंसान बन इंसानियत के फ़र्ज़ को ही निभा लूँ, क्षमा करें इश्वर की पदवी देकर उसके समक्ष मुझे शर्मिंदा न करे...मैं जानती थी की मेरे इस लेख को केवल हिन्दू समाज के लोग ही अधिक महत्व देंगे..शायद कुछ बुरा,शायद कुछ अच्छा...लेकिन आलोचनाओं ने तो सदा मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा ही दी है..योगीजी आपकी कोई बात मुझे बुरी नही लगी. बरहाल ये लेख न तो मैंने सुर्खियाँ बटोरने के लिए लिखा न किसी का दिल दुखाने के लिए.सत्य यही की जो मैंने बचपन से महसूस किया वही लिख दिया..और आप ये जानकर और भी अचंभित होंगे की मेरे बचपन से ही मेरे पडोसी व् रिश्तेदार मुझे देखते ही कहा करते थे की ये तो देखने में ही हिन्दुओं की बच्ची लगती है. वो क्यूँ ऐसा कहते थे मुझे भी नहीं पता...माताजी अक्सर मुझे बताती हैं. बहरहाल मैं सभी धर्मों को मानती हूँ, आदर करती हूँ..क्यूंकि सभी मैं अछे व् नैतिक उपदेश हैं..केवल नहीं मानती जात-पात,हिन्दू-मुस्लिम व् कट्टरता. मैंने तो पढ़ा है कुरआन में की स्वयं को व् स्वयं के विचारों को इश्वर जैसा बनाओ, बस छोटी सी कोशिश करती चली जा रही हूँ...क्यूंकि ये कट्टरता मेरी समझ के बाहर है...या फिर यूँ कह लें की लोग खुद इतने कट्टर हो गए हैं की कट्टरता के आगे कुछ और देखना ही नहीं चाहते. क्यूँ? क्यूंकि उन्हें उनका अभिमान प्यारा है. और मेरी सोच वाले लोग मेरे धर्म में आपको मुट्ठी भर तो छोडिये शायद मिले ही न. लेकिन हिन्दू समाज में ऐसी सोच वालों की एक लम्बी कतार है ये आप भी जानते होंगे..और जनाब बस मेरे लिए यही काफी है...कोई भी मुझे ये सब कहने,सुनने,और बोलने से रोक सकता है लेकिन सोचने से नही...विचार आने से नही...मुझे तो मेरा खुदा मेरे साथ साथ चलते हुए मुझे महसूस होता है...और कहता है अमानत सब जगह प्यार फेलाओ ये तुहारी और तुम जैसे लोगों की पहली ज़िम्मेदारी है...इस कोशिश में आप जैसे लोगों का ही साथ चाहिए और आशा भी है...आमीन. धन्येवाद.

के द्वारा: amanatein amanatein

अमानत जी, आपके विचारों में सत्यता है, आपकी मानसिकता में सत्यता है, और यह लेख लिखकर आपने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है, मेरी यही आशा है की आप बुरी मानसिकता के कट्टर लोगों से सदैव विजयी हों, श्रेष्ठ विचारों द्वारा सभी को एक होने का एहसास कराने के लिए शुक्रिया मेरी अपनी एक कविता के साथ बात को ख़त्म करना चाहुंगा- जब मै बहुत ही छोटा था तब मेरे माँ-बाप ने मुझे कहा की बेटा तुम इंसान हो बहुत फर्क है तुममे और जानवर में, जब मै थोडा बड़ा हुआ तब मेरे माँ-बाप ने मुझे कहा की बेटा तुम एक लड़के हो बहुत फर्क है तुममे और एक लड़की में, जब मै और भी बड़ा हुआ तब मेरे माँ-बाप ने मुझे कहा की बेटा तुम एक हिन्दू हो बहुत फर्क है तुममे और एक मुस्लिम में, जब मै और भी बड़ा हुआ तब मेरे माँ-बाप ने मुझे कहा की बेटा तुम इस जाति के हो बहुत फर्क है तुममे और अन्य जाति में अब जब मै हूँ बहुत बड़ा जब मुझसे कोई मिलता है नहीं पूंछता मुझसे कोई क्या तुम एक इंसान हो? नहीं पूंछता मुझसे कोई क्या तुम एक लड़के हो? ये बातें तो सभी जान जाते हैं मुझको देखकर लेकिन मुझसे अक्सर ही यह पूंछा जाता क्या है धर्म तुम्हारा? तुम किस जाति के हो? आखिर क्यों यह बात नहीं वे पाते जान? तब मै यही सोंचता हूँ की क्या वाकई ये धर्म है मेरा क्या वाकई ये जाति है मेरी या फिर धर्म से मैं इंसान हूँ और जाति मेरी है पुरुष….. हो सके तो मेरे ब्लॉग पर आकर इस कविता पर प्रतिक्रिया दीजियेगा http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/05/31/मैं-कौन-हूँ-कौन-हो-तुम/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

सादर नमस्कार अमानत जी, यही तो बात है की एक तरफ एक बहुत बड़ा वर्ग है जो इस दहेज़ प्रथा के चक्कर में तबाह होता चला जा रहा है, कुछ औरतें मौत के घाट उतार दी जाती हैं, कुछ की जिंदगी जीते जी नरक बना दी जाती है और दूसरी तरह एक ऐसा वर्ग है जो एक कुप्रथा को बढ़ावा देता चला आ रहा है, क्योंकि उन्हें लगता है की उनकी इतनी सामर्थ्य है की वे अपनी लड़की के लिए अच्छे से अच्छा सामान खरीद सकते है, आज-कल लड़के भी बिकाऊ हैं उनमे से अच्छे से अच्छा लड़का खरीद लेंगे....किन्तु वे यह भूल जाते हैं की लालच का कोई अंत नहीं होता, एक बार अगर किसी के ह्रदय में लोभ की आग जल गयी तो आप देते-देते परेशान हो जाओगे और अगला आपसे मांगता ही रहेगा, ज़्यादातर ऐसे ही लोगों की बेटियों को शादी के बाद और दहेज़ के लिए सताया जाता है फिर एक दिन या तो लड़की की मौत की खबर आती है या फिर लड़की वापस आ जाती है की पिता जी मुझे उन दरिंदों के साथ नहीं रहना, बस तलाख चाहिए, तब दहेज़ उत्पीडन का केस दर्ज होता है...और लड़की का बाप एक अच्छे से वकील को खरीदता है....और फिर सच्चे-झूठे आरोप तब ऐसे लोग पछताते हैं I यह तो बात रही वधु पक्ष की वर पक्ष की तरफ से लड़का यदि दहेज़ के बिना शादी करता है, जैसा की लव मैरिज में होता है, तब लड़के और उस लड़की दोनों को कई सालों तक सुनना पड़ता है की इतने लाख का था मेरा लड़का, लेकिन उसको तो इस लड़की ने फसा लिया, इतना खर्च किया लड़के की पढ़ाई-लिखाई पालन-पोषण पे कुछ भी नहीं मिला.... बताइये माँ-बाप क्या लड़के को इसीलिए पढ़ाते-लिखाते और पालते हैं की एक दिन किसी लड़की के बाप से उसका मूल्य वसूल करें? सुधर जाओ....दहेज़ लेना देना दोनों बंद कर दो, इंसान को इंसान समझो इंसानों के सौदे मत करो....ये किसी की संपत्ति नहीं हैं जिनका सौदा किया जाए...यदि लड़का लड़की दोनों सक्षम हैं तो वो बहुत कम सकते है किन्तु अक्षम हैं तो कोई दहेज़ उनकी जिंदगी को खुशहाल नहीं बना सकता, इंसानियत के खिलाफ होने वाले हर जुर्म को मुंह तोड़ ज़वाब देना मेरा फ़र्ज़ है, आपके लेख के लिए आपको बधाई मेरी एक रचना पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/08/01/my-name-is-sunny-leone/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

हाथ जोड़कर नमस्कार सर जी, सच कहूँ तो मुझे किसी और चीज़ से इतना नहीं जितना आपके शब्दों और सहयोग से शक्ति मिलती है. मैं खुद आपसे विचार विमर्श करने के लिए उत्सुक हूँ और जल्दी ही आपके साथ फसबूक या ईमेल दुआरा संपर्क करूंगी .. आपसे एक प्रार्थना है कि हो सके तो मेरे इन लेखों को दूजे लोगों को भी भेजकर उन्हें भी दहेज़ की वास्तविकता से अवगत कराये क्यूंकि सर ये लेख नहीं है ये जंग है, सिर्फ एक नहीं हर बुराई के खिलाफ जिसे मैं घर घर तक पहुँचाना चाहती हूँ जिसमें आपके सहयोग व् विचारों कि आवशकता मुझे पहले है. और अत्यंत उत्सुक हूँ आपके लेख अप्धने क लिए क्यूंकि पूरा दिन ऑफिस में बीत जाता है और अपना कंप्यूटर न होने के कारन भी मैं इन्हें पढ़ नही पा रही किन्तु ये समस्या भी में जल्दी ही दूर करना चाहती हूँ क्यूंकि जब जंग छिड़ ही चुकी है तो इसे बिना रुके अंजाम तक भी पहुचाना है. बहुत बहुत धनयवाद ...आप अपना सहयोग बनाएं रखें

के द्वारा: amanatein amanatein

के द्वारा: amanatein amanatein

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal Khan Dr. Anwer Jamal Khan

आप अमानत नाम ही पुकारें सर.क्यूंकि न में तो हिन्दू हूँ न मुस्लिम एक इंसान हूँ बस. धर्मों का झगड़ा मुझे कभी समझ नहीं आया और आएगा भी नहीं वो कैसे मैं जल्दी ही अपने एक और लेख में इसका jawab दूंगी. और हाँ आपकी एक कविता जो आपने घुमंतू नामक ब्लॉग पर कुरान व् ईश के सम्बन्ध में कमेंट्स के रूप में कही है से में बहुत प्रभावित हुई. बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर कविता. तारीफ के लिए अलफ़ाज़ नहीं हैं . लिखना जारी रखें सर आप जैसे लोगों की लेखनी से ही हम जैसी नस्लों व् युवकों को सीखने को मिलता है क्यूंकि अच्छे लेखक नहीं है और नहीं अच्छी किताबें हैं और तो और न ही अच्छा मनोरंजन है कि परिवार के साथ मिल बैठ कर देख लें . आभार आपके सुझाव के लिए. शुक्रिया.

के द्वारा: amanatein amanatein

हाथ जोड़कर आप सभी को नमस्कार, मुझे व् मेरे लेख को आप सभी लोग इतनी जल्दी एहमियत देंगे कम उम्मीद थी मुझे . लेकिन जब दे ही दी है तो आप सभी का साथ चाहिए इस नासूर को मिटाने के लिए. ये सब सिर्फ लेख नहीं है आपबीती है जिन्हें मैं दुनिया के सामने लाना चाहती थी और आपही इसमें मुझे कामयाब बना रहे है…बाखुदा बहुत ही खुश हूँ और चाहती हूँ की अपने आस पास के लोगों को आप भी जागरूक करे. जैसा की दिनेश जी मुझे दो बार कह भी चुके है कि आप सब मिलकर कोई अभियान चलायें हम आपक साथ है. सच कहूँ बीते एक महीने से ये जंग में अकेले लड़ रही थी कोई पागल समझता तो कोई हंसी उडाता लेकिन उन सभी के ये कमेंट्स मुझे कमज़ोर नहीं करते बल्कि और मज़बूत बनाते. क्यूंकि मैंने इन सभी से बचने के लिए अपनी प्यारी किताबों से बहुत मदद ली है जिसमें एक जगह गांधीजी कहते है की पहले वो आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हंसेगे,फिर वो आप से लड़ेंगे और तब आप जीत जायेंगे आप सभी ने मुझे जिता दिया है. जानती हूँ ये शुरुआत है और एक लम्बी लड़ाई लड़नी है …जिसकी तय्यारी मैंने काफी पहले से शुरू कर दी थी और आपने हाथ बढाकर इसे मज़बूत बना दिया है. मेरा मार्गदर्शन करने में मेरे कुछ ख़ास दोस्त सदा साथ रहे लेकिन एक दोस्त जिनका नाम में यहाँ शेयर करना चाहती हूँ दीपक शर्मा जो सभी में ख़ास हैं. thanx dd. आप सभी का धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए …और आगे भी आपके जवाब व् सुझाव का इन्तिज़ार रहेगा क्यूंकि मैं आप सभी का साथ तहे दिल से चाहती हूँ एक बार फिर शुक्रिया .

के द्वारा: amanatein amanatein

हाथ जोड़कर आप सभी को नमस्कार, मुझे व् मेरे लेख को आप सभी लोग इतनी जल्दी एहमियत देंगे कम उम्मीद थी मुझे . लेकिन जब दे ही दी है तो आप सभी का साथ चाहिए इस नासूर को मिटाने के लिए. ये सब सिर्फ लेख नहीं है आपबीती है जिन्हें मैं दुनिया के सामने लाना चाहती थी और आपही इसमें मुझे कामयाब बना रहे है...बाखुदा बहुत ही खुश हूँ और चाहती हूँ की अपने आस पास के लोगों को आप भी जागरूक करे. जैसा की दिनेश जी मुझे दो बार कह भी चुके है कि आप सब मिलकर कोई अभियान चलायें हम आपक साथ है. सच कहूँ बीते एक महीने से ये जंग में अकेले लड़ रही थी कोई पागल समझता तो कोई हंसी उडाता लेकिन उन सभी के ये कमेंट्स मुझे कमज़ोर नहीं करते बल्कि और मज़बूत बनाते. क्यूंकि मैंने इन सभी से बचने के लिए अपनी प्यारी किताबों से बहुत मदद ली है जिसमें एक जगह गांधीजी कहते है की पहले वो आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हंसेगे,फिर वो आप से लड़ेंगे और तब आप जीत जायेंगे आप सभी ने मुझे जिता दिया है. जानती हूँ ये शुरुआत है और एक लम्बी लड़ाई लड़नी है ...जिसकी तय्यारी मैंने काफी पहले से शुरू कर दी थी और आपने हाथ बढाकर इसे मज़बूत बना दिया है. मेरा मार्गदर्शन करने में मेरे कुछ ख़ास दोस्त सदा साथ रहे लेकिन एक दोस्त जिनका नाम में यहाँ शेयर करना चाहती हूँ दीपक शर्मा जो सभी में ख़ास हैं. thanx dd. आप सभी का धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए ...और आगे भी आपके जवाब व् सुझाव का इन्तिज़ार रहेगा क्यूंकि मैं आप सभी का साथ तहे दिल से चाहती हूँ एक बार फिर शुक्रिया .

के द्वारा: amanatein amanatein

आदाब, यमुना जी जब तक आप और मेरी जैसी महिलाएं मिलकर इस दहेज़ दानव का विरोध नहीं करेंगी तब आप की और मेरी पीढ़ी इस दहेज़ दानव को झेलेगी और सोच कहूँ तो हम पर थूकेगी. आपसे इल्तिजा है अपने चारों तरफ के लोगों को जगाएं उनकी सोयी हुई आत्माओं को जगाएं, और खासकर औरतों से कहें की दहेज़ को मिटाना आसन है सिर्फ एक शब्द न कहकर. कुछ परिवार मिलकर एक हो जाएं और हर बार दहेज को न कहें. न कहें न कहें...म जानती हूँ यूँ तो अपनी बेटियों के लिए रिश्ते आने ही बंद हो जायेंगे शायद आप य सोचें..लेकिन आप नहीं जानती मैंने खुद अपने ऐसे ही कितने रिश्तों को ठुकरा दिया. क्यूंकि एक ऐसा पति जो मेरी कमाई पर जीना चाहता हो भला मैं उसकी कैसे इज्ज़त कर पाऊँगी. अगर इस दुनिया में नहीं है कोई ऐसा शख्स जो मेरी फीलिंग्स न समझ सके, तो मैं अकेली ही भली . ज़िन्दगी मेरी ज़रूरत मंदों के नाम सही ...कृपया दहेज़ को न कहें .....

के द्वारा: amanatein amanatein

आदरणीय बहन, सादर नमस्कार, मैं लड़की नहीं हूँ, यह मेरे हाथ में नहीं था।  हाँ मैं एक बहन का भाई हूँ और एक बेटी का पिता भी। दहेज की भयावहता को जानता हूँ। दहेज लेने का तो मैं कट्टर विरोधी हूँ। अपनी शादी में मैंने दहेज के  नाम पर एक रुपया भी नहीं लिया था और तथा किसी ऐसी शादी में जिसमें दहेज लिया गया हो लड़के की और से शादी अटेन्ड नहीं करता। अतः मुझे बारात में जाने का अवसर प्राप्त नहीं होता। हाँ लेकिन लड़की की शादी में हम विवश हो जाते हैं,  दहेज देने के लिये। अपनी बहन की शादी में भी दिया था। और शायद बेटी की शादी  में भी देना पड़े। यदि आप जैसी बहनें संगठित होकर सामाज में जागृति लाकर सामाजिक कुरीतियों का विरोध करेंगी तो एक दिन निश्चित ही बदलाव आयेगा।  जहाँ तक खुदा का सवाल में तो मेरा मानना है कि खुदा ने समाज में इतनी विषमतायें कर रखी हैं कि मैं उसे अन्यायी मानता हूँ।  कृपया दहेज एवं खुदा के संबंध में मेरी कवितायें एवं आलेख जरूर पढ़े। http://dineshaastik.jagranjunction.com/author/dineshaastik/page/2/ http://dineshaastik.jagranjunction.com/author/dineshaastik/page/4/ http://dineshaastik.jagranjunction.com/author/dineshaastik/page/5/ http://dineshaastik.jagranjunction.com/author/dineshaastik/

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik




latest from jagran